एक संत गांव से गुजर रहे थे। उन्होंने लहलहाते हुए गेहूं के पौधों को देखकर कहा, 'भगवान की कृपा से इस बार फसल बहुत अच्छी हुई है।
खेत के किनारे हुक्का गुड़गुड़ाते हुए किसान ने यह सुना तो वह बोला,साधु बाबा, इसमें भगवान की कृपा कहां से
आ टपकी।
मैंने खून-पसीना एक कर खेत जोता, बीज बोया तथा पानी देता रहा।
मेरे परिश्रम के कारण ही खेत लहलहा रहा।' संत ने किसान के शब्द सुने तथा मुस्कराते हए आगे बढ़ गए।
कुछ दिन बाद संत उसी रास्ते से लौट रहे थे।
उन्होंने उसी खेत के किनारे लगे पेड के नीचे विश्राम किया। उन्होंने देखा कि गेहूं के पौधे झुलसे पड़े हैं।
उनमें कीड़ा भी लग गयाथा। किसान संत के लिए लोटा भर कर पानी लाया।
संत ने दुखी मन से सहानुभूति व्यक्त की और कहा, 'भैया बहुत बुरा हुआ। हरे-भरे खेतों को क्या हो गया?
' किसान ने कहा, 'महाराज, मुझे भगवान ने तबाह कर दिया। तमाम फसल को कीड़ा चट कर गया।
यह सुनते ही संत ने कहा, 'भैया, पिछले दिनों तो तुम खेत लहलहाते देखकर कह रहे थे कि भगवान की कृपा क्या
होती है, सब मेरे परिश्रम का फल है।
अब बेचारे भगवान को इस तबाही का दोष क्यों देते हो?
किसान समझ गया कि कुछ पाने के लिए परिश्रम के साथ -साथ भगवान अर्थात प्रकति की मेहरबानी भी जरूरी है।
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