प्रस्तुत कहानी में रामन नामक बालक की समझ और चतुराई का रोचक वर्णन किया गया है। कई वर्ष पहले एक घने जंगल में चार चोर रहते थे। चुराया हुआ धन वे एक साधारण से बर्तन में रखते थे, लेकिन उसकी हिफ़ाजत जान से भी ज़्यादा करते थे। कुछ अरसे बाद उनका मन चोरी-चकारी से ऊब गया। “मैं तो ऐसी जिंदगी से तंग आ गया हूँ। हमें हमेशा चौकन्ना रहना पड़ता है, वरना हम पकड़े भी जा सकते हैं।", एक ने अपना दुखड़ा रोया। “हाँ, मैं भी चाहता हूँ कि हम लोग एक शांत-सच्ची जिंदगी जिएँ!", दूसरे चोर ने हाँ में हाँ मिलाई। 'बहुत अच्छा! हम जंगल छोड़कर किसी ऐसे शहर में चलते हैं, जहाँ हमें कोई जानता न हो। शायद कोई साफ़-सुथरा काम-धंधा ही हाथ लग जाए", तीसरा बोला। तीन चोरों को तो यह सुझाव पसंद आया और उन्होंने तय कर लिया कि वे जंगल छोड़ देंगे, लेकिन चौथे चोर को अपनी जीविका के लिए कोई खरा धंधा करने की योजना पसंद नहीं आई। उस समय तो वह चुप रहा, लेकिन उसने बर्तन में रखे पैसे चुराकर भाग जाने इरादा कर लिया। वह सही मौके का इंतज़ार करने लगा। चारों चोर एक शहर में पहुंचे और वहाँ एक धर्मशाला 'छत्रम' में...
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