माला फेरत जुग भया : माला फेरते फेरते युग बिता दिए. फि रा न मन का फेर: लेकिन अब तक मन शांत नही हुआ. कर का मनका डार दे: हाथ का मनका छोड़ दे. मन का मनका फेर: मन की माला फेरना शुरू कर इस दोहे में कबीर जी कहते हैं कि भगवान का नाम लेते लेते, माला जपते-जपतेे तुमने युगों-युग बिता दिए। सारा जीवन तुमने माला के मनके घूमाने में लगा दिया। लेकिन अब तक तुम्हे अपने मन की शांति की प्राप्ति नहीं हुई। जिस मन की शांति के लिए तुम सदा भगवान की माला जपते रहते हो वह शांति तुम्हें आज तक नहीं मिली इसलिए इस हाथ में पकड़े मनके को जिसे तुम माला में डालकर घुमा रहे हो इन्हें छोड़ कर अपने मन के मनको का ध्यान करो। अपने मन को शुद्ध करो, अपने विचार में शुद्धता लाओ तभी तुम्हें मन की शांति की प्राप्त होगी। व्याख्या : सिर्फ भगवान की स्तुति करना या माला जपते रहने से मन शांत हो जाएगा ऐसा सोचना गलत है। क्योंकि मन की शांति तभी मिलती है ज...
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