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मेहनत और मेहरबानी | Mehnat aur Mehrbani Story

 एक संत गांव से गुजर रहे थे। उन्होंने लहलहाते हुए गेहूं के पौधों को देखकर कहा, 'भगवान की कृपा से इस बार फसल बहुत अच्छी हुई है। खेत के किनारे हुक्का गुड़गुड़ाते हुए किसान ने यह सुना तो वह बोला,साधु बाबा, इसमें भगवान की कृपा कहां से  आ  टपकी।  मैंने  खून -पसीना  एक कर खेत जोता, बीज  बोया तथा पानी देता रहा।  मेरे परिश्रम के कारण ही खेत लहलहा रहा।' संत ने किसान के शब्द सुने तथा मुस्कराते हए आगे बढ़ गए।  कुछ दिन बाद संत उसी रास्ते  से लौट रहे थे।    उन्होंने उसी खेत के किनारे लगे  पेड के नीचे विश्राम किया। उन्होंने देखा कि  गेहूं  के पौधे झुलसे पड़े हैं।  उनमें कीड़ा भी लग गयाथा। किसान संत के लिए लोटा भर कर पानी लाया।  संत ने दुखी मन से  सहानुभूति व्यक्त की और कहा, 'भैया  बहुत बुरा हुआ। हरे-भरे खेतों को क्या हो गया? ' किसान ने कहा, 'महाराज,  मुझे भगवान ने तबाह कर दिया। तमाम फसल को कीड़ा चट कर गया।  यह  सुनते ही संत ने कहा, 'भैया, पिछले दिनों तो तुम खेत लहलहाते देखकर कह रहे थे...

डाकू अंगुलिमाल और महात्मा बुद्ध || Buddha Angulimal Story in Hindi

  बहुत पुरानी बात है मगध राज्य में एक सोनापुर नाम का गाँव था। उस गाँव के लोग शाम होते ही अपने घरों में आ जाते थे। और सुबह होने से पहले कोई कोई भी घर के बाहर कदम भी नहीं रखता था।इसका कारण डाकू अंगुलीमाल था।      डाकू अंगुलिमाल मगध राज्य के जंगलों में रहता था। लोगों को लूटना और उनको जान से मार देना उसका काम था।  व्यक्ति को भी मार कर उसकी एक ऊंगली काटकर उसकी माला बनाकर पहन लेता था, जिससे उसका नाम अंगुलिमाल हो गया।  डाकू ने एक हज़ार अंगुलियां पहनने की कसम खाई थी।  एक दिन महात्मा बुद्ध उस जंगल के समीप बसे गांव में आए। बुद्ध ने गांववालों से पूछा आप लोग इतने डरे हुए क्यों लग रहे हो।  गांववालों ने डाकू के डर की बात कही। अगले दिन बुद्ध उसी जंगल की तरफ निकल गए। गांववालों ने बुद्ध को रोकना भी चाहा, लेकिन बुद्ध नहीं माने।  जंगल के बीच मचान पर बैठे अंगुलिमाल ने बुद्ध को देखा और मचान से उतरकर, हाथ में तलवार लेकर बुद्ध की तरफ भागा। बुद्ध आगे बढ़े जा रहे थे अंगुलिमाल पीछे से जोर-जोर से बोल रहा था ‘रुको’ ‘रुको’।  बुद्ध नहीं रुके, डाकू को और क्रोध आ गया वो...