एक था जंगल। उस जंगल में एक शेर भोजन करके आराम कर रहा था। इतने में एक मक्खी उड़ती- उड़ती वहाँ आ पहुँची। शेर ने दो-तीन दिनों से स्नान नहीं किया था। इसलिए मक्खी शेर के कान के एकदम पास भिन-भिन-भिन करने लगी। शेर को बहुत मुश्किल से नींद आई थी। उसने पंजा उठाया। मक्खी उड़ गई ... लेकिन फिर से शेर के कान के पास भिन-भिन शुरू हो गई। अब शेर को गुस्सा आया। वह दहाड़ा-अरे मक्खी , दूर हट। वरना तुझे अभी जान से मार डालूँगा। मक्खी ने धीरे से कहा- छि... छि... ! जंगल के राजा के मुँह से ऐसी भाषा कहीं शोभा देती है? शेर का गुस्सा बढ़ गया। उसने कहा – एक तो मुझे सोने नहीं देती, ऊपर से मेरे सामने जवाब देती है! चुप हो जा... वरना अभी... मक्खी बोली – वरना क्या कर लोगे? मैं क्या तुमसे डर जाऊँगी? मैं तो तुमसे भी लड़ सकती हूँ। हिम्मत हो तो आ जाओ...! शेर आग बबूला हो उठा। उसने कान के पास पंजा मारा। मक्खी तो उड़ गई पर कान ज़रा छिल गया। मक्खी उड़कर शेर की नाक पर बैठी तो उसने मक्खी को फिर पंजा मारा। मक्खी उड़ गई। अबकी बार शेर की नाक छिल गई। मक्खी कभी शेर के माथे पर बैठती, कभी गाल पर, तो कभी गर्दन पर। शेर पंजा मारत...
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