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शेखीबाज़ मक्खी | shekhibaj makhi

 एक था जंगल। उस जंगल में एक शेर भोजन करके आराम कर रहा था। इतने में एक मक्खी उड़ती-

उड़ती वहाँ आ पहुँची। शेर ने दो-तीन दिनों से स्नान नहीं किया था। इसलिए मक्खी शेर के कान

केएकदम पास भिन-भिन-भिन करने लगी। शेर को बहुत मुश्किल से नींद आई थी। उसने पंजा

उठाया। मक्खी उड़ गई ... लेकिन फिर से शेर के कान के पास भिन-भिन शुरू हो गई।

अब शेर को गुस्सा आया।वह दहाड़ा-अरे मक्खी , दूर हट। वरना तुझे अभी जान से मार डालूँगा। मक्खी

ने धीरे से कहा- छि... छि... !जंगल के राजा के मुँह से ऐसी भाषा कहीं शोभा देती है?




शेर का गुस्सा बढ़ गया। उसने कहा – एक तो मुझे सोने नहीं देती, ऊपर से मेरे सामने जवाब देती है! चुप हो जा... वरना अभी...

मक्खी बोली – वरना क्या कर लोगे? मैं क्या तुमसे डर जाऊँगी? मैं तो तुमसे भी लड़ सकती हूँ। हिम्मत हो तो आ जाओ...!



शेर आग बबूला हो उठा। उसने कान के पास पंजा मारा। मक्खी तो उड़ गई पर कान ज़रा छिल गया।

मक्खी उड़कर शेर की नाक पर बैठी तो उसने मक्खी को फिर पंजा मारा। मक्खी उड़ गई। अबकी

बार शेर की नाक छिल गई।

मक्खी कभी शेर के माथे पर बैठती, कभी गाल पर, तो कभी गर्दन पर।

शेर पंजा मारता जाता और खुद को घायल करता जाता... मक्खी तो फट से उड़ जाती। __ अंत में शेर

ऊब गया, थक गया। वह बोला – मक्खी बहन, अब मुझे छोड़ो। मैं हारा और तुम जीतीं, बस।

मक्खी घमंड में चूर होकर उड़ती-उड़ती आगे बढ़ी। सामने एक हाथी मिला। मक्खी ने कहा - अरे

हाथी... मुझे प्रणाम कर... मैंने जंगल के राजा शेर को हराया है। इसलिए जंगल में अब मेरा राज चलेगा।

हाथी ने सोचा, इस पागल मक्खी से बहस करने में समय कौन बर्बाद करे।

हाथी ने सैंड ऊपर उठाकर मक्खी को प्रणाम किया और आगे बढ़ गया। सामने से आ रही लोमड़ी ने

यह सब देखा। लोमड़ी मंद-मंद मुस्कराने लगी। इतने में मक्खी ने लोमड़ी से कहा – अरे ओ लोमड़ी,

चल मुझे प्रणाम कर! मैंने जंगल के राजा शेर और विशालकाय हाथी को भी हरा दिया है।


लोमड़ी ने उसे प्रणाम किया। फिर धीरे से बोली -

धन्य हो मक्खी रानी, धन्य हो! धन्य है आपका ।

जीवन और धन्य हैं आपके माता-पिता। लेकिन

मक्खी रानी, उधर वह मकड़ी दिखाई दे रही है न,

वह आपको गाली दे रही थी। उसकी ज़रा खबर लो

न! यह सुनकर मक्खी गुस्से से लाल हो उठी।

मक्खी बोली – उस मकड़ी को तो मैं चुटकी बजाते

खत्म कर देती हूँ।

यह कहते हुए मक्खी मकड़ी की तरफ झपटी और

मकड़ी के जाले में फँस गई। मक्खी जाले से छूटने

की ज्यों-ज्यों कोशिश करती गई त्यों-त्यों और भी

अधिक फँसती गई... अंत में वह थक गई, हार गई।

यह देखकर लोमड़ी मंद-मंद मुस्कराती हुई वहाँ से चलती बनी।

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