यूनान के प्रशिद्ध संत सुकरात दार्शनिक थे| जब से उन्होंने उपदेश देने शुरु किए उनके घर सवेरे से शाम तक सत्संग के लिए आने वालो का ताँता लगने लगा | सुकरात की पत्नी कर्कश स्वभाव की थी | वह सोचती थी कि निठल्ले लोग बेकार ही उसके घर अड्डा जमाए रखते है | वह समय-समय पर उनके साथ रुखा व्यवहार करती | इस बात से सुकरात को दुःख होता |
एक दिन सुकरात लोगो के साथ बतिया रहे थे कि पत्नी ने उनके उपर छत से गंदा पानी उलीच दिया | इतना ही नही वह उन्हें निठल्ला कहकर गालीया भी देने लगी | सत्संगीयो को यह उनका अपमान लगा |
सुकरात को भी यह व्यवहार बुरा लगा परन्तु उन्होंने बहुत धैर्य के साथ उपस्थित लोगो से कहा “आप सभी ने सुना होगा कि जो गरजता है वह बरसता नहीं | आज तो मेरी पत्नी ने गरजना-बरसना साथ साथ कर उपरोक्त कहावत को ही झुठला दिया है ” सुकरात के विनोद भरे ये शब्द सुनते ही तमाम लोगो का क्रोध शांत हो गया | वे पुन: सत्संग में लिप्त हो गये | सुकरात का धैर्य देखकर उनकी पत्नी चकित रह गयी | उसी दिन से उसने अपना स्वभाव बदल दिया| उसने सुकरात के पास आने वालों का आदर-सम्मान और सत्कार करना शुरु कर दिया |
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